श्री स्वामी भीष्म जी महाराज: एक संक्षिप्त परिचय

swami bhishm ji
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श्री स्वामी भीष्म जी महाराज: एक संक्षिप्त परिचय

स्वामी भीष्म जी का जन्म 07 मार्च 1859 में एक निर्धन पांचाल ब्राह्मण परिवार में हुआ। पिता का नाम बारू राम माता का नाम पार्वती देवी था।

सन् 1878 में क्रान्तिकारियो से मिलकर एक योजना के तहत फौज की 62 नम्बर पलटन में भर्ती हो गए, लगभग डेढ़ दो साल के बाद वहां से हथियार व् असला लेकर भाग गए जो मेरठ में अपने देश दीवाने क्रांतिकारियों को सौंप दिया।
सन् 1881 में गोहाना के पास बलि ब्राह्मण गांव में एक तपस्वी वेदांती साधू से इंद्री छेदन की कठोर शर्त को पूरा कर सन्यासी बने और भीष्म ब्रह्मचारी के नाम से प्रसिद्ध हुए।। स्वामी जी को 18 -18 घण्टे की लम्बी समाधि लगाते लोगों ने देखा। लगभग 37-38 साल की आयु में स्वामी जी ने महऋषि दयानन्द का अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा और आर्य समाजी बन गए। स्वामी जी एक कवि और गायक थे लगभग 85 वर्ष स्वामी भीष्म जी ने आर्य समाज के भजनोपदेशक के रूप में काम किया।
सन् 1897 में आप दिल्ली बस अड्डे के सामने यमुना किनारे आ कर रहने लगे।
1919 में रोलट एक्ट कानून के खलाफ स्वामी श्रद्धानन्द के साथ विरोध जलूस में अंग्रेजी संगीनों के सामने सीन तान कर खड़े थे। सन् 1923 में स्वामी श्रद्धानन्द जी के साथ अमृतसर में सिखों के धर्मयुद्ध में भाग लिया और घायल सिखों की सहायता की।
स्वामी भीष्म जी ने 1923 में स्वामी श्रद्धानन्द जी द्वारा स्थापित शुद्धि सभा जिसका काम हिन्दू से मुस्लिम बने भाई बहनों को पुनः हिन्दू धर्म में शामिल करना था इस सभा में बड़ी कठिन परिस्थितियों में जान जोखिम में डाल कर 5 वर्षों तक काम किया इस दौरान वो मुसलमान बन कर मस्जिदों में जाते उनकी हिंदुओं को मुस्लिम बनाने की गुप्त योजनाओं का पता लगा कर उनसे पहले ही हिंदुओं को मुस्लिम बनने से बचते या जो मुस्लिम बन चुके उन्हें पुनः हिन्दू बनाने का काम किया।
सन् 1927 में हिंडन नदी के किनारे जंगल में आकर (करेहड़ा जिला गाजियाबाद के जंगल में) रहने लगे स्वामी जी का यह आश्रम नाम मात्र की संस्कृत पाठशाला थी किन्तु वास्तव में यह देशभक्त क्रांतिकारियों के छुपने का अड्डा था।। यंहा चंद्र शेखर आजाद, भगत सिंह, अस्फाकुल्ला खान, चौधरी चरण सिंह, लाल बहादुर शास्त्री और राम चन्द्र विकल आदि आकर अनेको बार आकर स्वामी जी से सहायता प्राप्त करते थे।

1917 में स्वामी भीष्म जी महाराज के लम्बे प्रयास के बाद प्रथम बार अखिल भारतीय पांचाल ब्राह्मण महासभा का गठन हुआ इसी सभा का एक अधिवेशन 1929 में स्वामी जी के करेहड़ा आश्रम में ही हुआ। स्वामी भीष्म जी द्वारा संस्थापित इस संस्था के अथक प्रयास से 1930 में पहली बार सरकारी गजट में लोहार जाती के लिए पांचाल ब्राह्मण शब्द सम्मान पूर्वक लिखा गया।। स्वामी भीष्म जी ने लोहार जाति जिसको उस समय तथाकथित ब्राह्मण व् अन्य शुद्र अथवा कमीण कहा करते उनसे लगभग 17 बार विभिन्न स्थानों पर शास्त्रार्थ करके सिद्ध किया कि सभी विश्वकर्मा वंशी शुद्ध और श्रेष्ठ पांचाल ब्राह्मण हैं। इस विषय पर स्वामी जी ने पांचाल ब्राह्मण प्रकाश-1932, पांचाल ब्राह्मण दीपिका, शिल्पी ब्राह्मण, पांचाल परिचय, महऋषि विश्वकर्मा, विश्वकर्मा दर्शन भाग एक व् भाग दो तथा पांचाल ब्राह्मण गोत्रवली आदि पुस्तकें लिख कर समाज को जगाने का काम किया।

स्वामी भीष्म जी महाराज ने अपने जीवन में 85 सफल और प्रसिद्ध आर्य भजनोपदेशक शिष्य तैयार किये, लगभग 228 पुस्तकें लिखी जिनमे से लगभग 125 पुस्तकें आज भी उपलब्ध हैं। स्वामी जी के शिष्यों की सूचि बहुत लम्बी हैं डॉ राम मनोहर लोहिया, स्वामी रामेश्वरनन्द, मनी राम बागड़ी, बी पी मौर्य, राम चन्द्र जी विकल, ज्ञानी जैल सिंह, चरण सिंह व् लाल बहादुर शास्त्री आदि अनेक राष्ट्रीय स्तर के नेता स्वामी जी के शिष्य रहे हैं।

स्वामी जी करेहड़ा के बाद 1934 से 1936 तक पांचाल ब्राह्मण धर्मशाला पाण्डु पिंडारा में रहे 1936 में घरौंडा आकर रहने लगे।

स्वामी भीष्म जी की देश के प्रति सेवाओं को देखते हुए 1981 कुरुक्षेत्र में सार्वजनिक अभिनन्दन किया गया जिसमे चौधरी भजन लाल का पूरा मन्त्रीमण्डल और केंद्र से तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह सहित अनेको मंत्री व् कई राज्यो के राज्यपाल आदि स्वामी जी का सम्मान करने पहुंचे थे। जुलाई 1983 में कलकत्ता के अन्दर स्वामी जी का सार्वजनिक अभनन्दन जाति सदन हाल में बड़े शानदार तरीके से किया गया। 1983 में ही राष्ट्रपति बनने के बाद ज्ञानी जैल सिंह जी स्वामी जी के निमन्त्रण पर पांचाल ब्राह्मण धर्मशाला पाण्डु पिंडारा जींद में भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति स्थापना हेतु पधारे। 1980 अमेरिका में एक गोष्ठी में वेड प्रकाश बटुक ने स्वामी भीष्म जी के कार्यों पर एक निबन्ध पढ़ा और उनके देश के प्रति किये कार्यो की चर्चा की।

08 जनवरी 1984 में स्वामी भीष्म जी महाराज का शरीरांत हुआ उस समय एक प्रस्ताव राष्ट्रपति भवन से स्वामी जी को भारत रत्न देने के लिए गया किन्तु तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री मति इंद्रा गांधी ने नए नियम के अनुसार समय आभाव के कारण वर्ष 1985 में स्वामी जी को भारत रत्न का सम्मान देने की बात कही किन्तु दुर्भाग्य से 1984 अक्टूबर में इंद्रा जी की हत्या हो गई।। हरियाणा सरकार स्वामी जी को सम्मान के रूप में 1000 रुपए मासिक पेंशन देती थी।

ऐसे थे पांचाल ब्राह्मण समाज के गौरव स्वामी भीष्म जी महाराज।

References:
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=160698717603314&id=154628411543678


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